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Thursday, February 4, 2010

परिंदा और मैं



परिंदा,
पिंजरे के अन्दर,
चारो तरफ गोल-गोल चक्कर लगाया,
उड़ने के लिए पंख फडफडाये-
अफ़सोस उड़ न सका.....
मै साक्षी थी उसकी बेबसी,लाचारी,क्रोध और झल्लाहट की,!
समय के साथ वह
भूलता गया पंख फडफडाना,
समझौता कर लिया था उसने परिस्तिथियों से-
और भूल चूका था कि-
वह परिंदा है उन्मुक्त गगन का ....
हम दोनों में एक ही समता थी ...
परिस्तिथियों से सझौता कर लेने की...
और अपने सामर्थ्य को भूल जाने की........

2 comments:

  1. very beautiful poem,,,,,,,,,,,meetu ji.

    ReplyDelete
  2. bahut hi achhi kavita hai ,
    badhaai,,,,

    irfan saifi rahi

    ReplyDelete

 

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